बायकुला स्टेशन की विरासत कैसे बची
बायकुला स्टेशन को देखकर समझ आता है कि विरासत रोज़मर्रा की भी हो सकती है
मुंबई में हम अक्सर पुराने स्टेशनों को बस रास्ते का हिस्सा समझकर पार कर जाते हैं। बायकुला स्टेशन भी ऐसा ही है - ट्रेन पकड़ने की जल्दी, प्लेटफ़ॉर्म पर आती-जाती भीड़, और ऊपर से शहर की लगातार आवाज़ें। लेकिन इसकी इमारत को ध्यान से देखें तो यह सिर्फ़ एक यातायात केंद्र नहीं लगती, बल्कि मुंबई के लंबे शहरी इतिहास का बचा हुआ हिस्सा लगती है।
पुरानी इमारत, रोज़ का इस्तेमाल रेल मंत्रालय की इस पोस्ट में बायकुला स्टेशन को UNESCO Asia-Pacific का “Award of Merit” मिलने और उसकी मूल वास्तुकला के संरक्षण का उल्लेख है। मुझे इस खबर की सबसे अच्छी बात यह लगी कि संरक्षण किसी बंद संग्रहालय की इमारत का नहीं, एक चालू रेलवे स्टेशन का है। यहाँ विरासत को देखने के लिए अलग से टिकट लेकर जाना नहीं पड़ता। लोग काम पर जाते हुए, घर लौटते हुए, या किसी रिश्तेदार से मिलने निकलते हुए उसके बीच से गुजरते हैं।
संरक्षण का मतलब केवल नया रंग नहीं मुंबई में पुरानी इमारतों की मरम्मत कई बार केवल पेंट और चमकदार साइनबोर्ड तक सीमित दिखाई देती है। असली चुनौती यह है कि इमारत की पहचान बची रहे, लेकिन वह आज के यात्रियों के लिए सुरक्षित और उपयोगी भी बनी रहे। पुराने मेहराब, खिड़कियाँ, अनुपात और सामग्री जैसी चीज़ें छोटी लग सकती हैं, पर इन्हीं से किसी जगह का चरित्र बनता है। साथ ही, रोशनी, साफ़-सफ़ाई, संकेत-पट्ट और सबके लिए आसान रास्ते भी उतने ही ज़रूरी हैं।
क्या हम अपने स्टेशनों को थोड़ा ध्यान से देखते हैं? स्थानीय इतिहास मुझे इसलिए पसंद है क्योंकि वह किताब के पन्ने से ज़्यादा रोज़मर्रा की चीज़ों में मिलता है - किसी पुल के नीचे, पुराने बाज़ार के कोने में, या उस स्टेशन पर जहाँ हम दस मिनट से ज़्यादा रुकते ही नहीं। बायकुला का सम्मान शायद हमें यह याद दिलाता है कि सार्वजनिक परिवहन की जगहें भी शहर की स्मृति सँभालती हैं। उम्मीद है कि ऐसे संरक्षण में यात्रियों और आसपास के समुदाय की आवाज़ भी शामिल रहेगी। वरना सुंदर इमारत बच जाएगी, पर उसका जीवित शहर से रिश्ता कमज़ोर पड़ सकता है।